ग़रीबी जब भी मन से खिलाती है
ग़रीबी जब भी मन से खिलाती है तो कभी बेबस नहीं दिखती दहलीज़ पर आए अतिथि पर ग़रीबी जब प्यार लुटाती है तो कभी गुमसुम नहीं दिखती सच में जब ग़रीबी के आंगन में जब अमीर आता है कोई ख़शुी में डूब ग़रीबी इनती परेशान नहीं दिखती ज़रूर यह धोखा है,मुफ़लिसी का वर्ना ग़रीबी कभी अतिथि देवो भव: के आगे इतनी लाचार नहीं दिखती